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Wednesday, November 17, 2010

देवोत्थान एकादशी .-सिर्फ यादे टा रहि गेल .

जहिया सँ प्रवासी भेलहुँ ,देव  पीतर सबसँ गेलहुं .कतेको साल बीतल  देवोत्थान एकादशी के दिन गाँव में रहि पूजा देखला . परन्तु आब त सिर्फ  यादे टा रहि गेल अछि .ओकरे फ्लैश   बैक   में समय बीति जाइत अछि . एक दिन पहिले सँ बड़का कक्का कहथि, रबिन्द्र बुझल',काल्हि भगवान छह महिना के बाद जगथिन. विस्मित होइत पुछियनी ,कक्का  से कोना? अखन कि भगवान सुतल छथिन ? संसार कोना चलि रहल छै ? कहैत  बकलेल , इ कह; जे सुतल में कि हमरा सब संवेदनहीन भ जाएत छी ? नै  ने.. .सब प्राणी हुनके माया स एहि संसार में जीव रहल अछि. हमरा लोकईन त नाम   मात्र छी.  अच्छा हे याइद रखिह ,काल्हि स्कूल स फ़िरबा काल 'महंथ बाला' खेत स कने नीक ताकिक' चारि टा  कुशियार कटने अबिह. बीचहि में टोकि दियनी, कक्का भगवान सुतलखिन कहिया ? कहथि -भादव मास  एकादशी दिन शंखासुर राक्षस के मारि गाढ़ निन्न में सुति रहलाह आ' आब कार्तिक शुक्ल एकादशी दिन जागि जेताह.
स्कूल स फ़िरबा काल कुशियार लेने घर आबी . आँगन  चिकनी मैट स नीपल चकचक भेल रहै .सभ गोटे लागि जाई 'कुशियारक गुल्ला'  काटई में. एहि पूजा में कुशियारक गुल्ला सबस मुख्य भोगक प्रसाद. माय आ काकी पिठार लेने अरिपन बनाब में व्यस्त .बड़की  काकी कहथिन ,कुसुमसुन्नैर ,हम नहाई लेल जाई छी ,सूर्यास्त भ  गेलै,पूजा  में देर भेला  स 'बुढ़बा' फेर हल्ला करत .अहाँ कने तुलसी चौरा स 'धर्मराज' घर तक  अरिपन बना लीय. माय संगही संग लागि जाय अरिपन में. भगवानक पैर चिन्हित होइन ,खराम बनैल जाई पिठार स .ओही में सिंदूर लगेबाक कार्य करी हम सब. ताधैर भैया 'पेट्रोमाक्स' लाइट  स आँगन के प्रकाशित क़ लैथ.  बड़का कक्का एक हाथ में फुल्दाली आ दोसर हाथ में अछिन्जल लेने आबि, बीच आँगन में अरिपन स  चारू तरफ सुसज्जीत 'भगवानक आसन' लग आसनी पर बैस, पुजाक  सामग्री मंगबा पूजा शुरू करैथ. काकी आबि क़ नारिकेर,मखान ,मिश्री के भोग बाला डाली सजबथी.हम सब  धुप दीप आ अगरबत्ती जराबी . पाछु दुआइर स  धर्मराजक गीत शुरू करैथ भौजीसब. . एमहर  गीत ,मंत्रोचार आ अगरबत्तीक़ सुगंध स आँगन मंदिर में परिवर्तित बुझाई .की भव्य रमणीय आभास !.बीच बीच में दीप में बाती आ घी के ध्यान   राखी हम . आरती के समय स पहिले  'विष्णु' कक्का के आँगन स घड़ी -घंटा दौरिक़ लाबी . कर्पुर गौरंगकरुनावतारम ......शुरू भ जाए आरती. बीचहिं में पितियौत कक्का ,भैया सब घडी -घंटा के आवाज सुनि दौरथी आरती में ,डरे की कहीं बाद में बड़का कक्का  के डांट नै सुनी. चारि गोटे दहिना हाथें 'शालीग्राम ' भगवान के आसन के ऊपर नीचा क़ ,जगाबथी. आ एहि तरहे एकादशी पूजा सम्पन्न भ जाई. आब त सिर्फ यादे टा रहि गेल .......