बीति गेल इहो एकटा साल '२०१०'.साल दर साल एहिना बीतल जाएत .फर्स्ट जनवरी मनाएब.
फेर नब्को साल पुरान भ, बीति जाएत. बीतल साल जे हासिल भेल तकर खुशी मनाऊ , जे प्राप्त नहीं केलहुं, तकरा नव वर्ष में अपन प्रयास स सफल करी, यैह एहि नया साल २०११ में संकल्प करू. अपन प्रयास करब अपना हाथ ,बाकी समय के साथ. अपने सभ गोटें कें नव वर्षक बहुत बहुत शुभकामना .नव साल में हमर अहाँ के सब मनोकामना पूरा होए ....यैह अभिलाषा ......नव वर्षक शुभकामना .....
Thursday, December 30, 2010
Friday, November 19, 2010
celebration of "Sama-Chakeba"
Celebration:
Since, Chhat parna or saptami of kartik shukla , Maithil sisters start to make the clay idols of Sama Chakeba, the villain Chugila and Vridavan .In the evening, they regularly meet on the streets to sing ,dance and enjoy the festivity. The sisters recite the poems ( popularly called ‘Phakara’)in the memory of Sama,Chakeba and the brothers love and pray for their long life and prosperities. It is said, that on the day Ekadashi itself, the vidai of Sama is fixed & scheduled to Kartik Purnima. Hence ,devotthan ekadashi onward, sisters start the decoration ,colouring and putting all the cloths made for all the characters ;Sama, Chakeba and Chugila similar to their thoughtful resemblance. ..By kartik purnima, they complete their preparation of ‘Vidai’ with all the symbolic household materials as gifts. On the Kartik Purnima, sisters start the vidai with singing ,dancing along the way to nearby cultivated land (jutalaha khet) taking all the decorated idols in Basket (dali). The brothers give the company and enhance the joyous aura to the function up to farm/khet. Brothers split the idols putting on their knees and is immersed/hidden in to the cultivated soil ie.Bhasauin . The sisters give sweets to their brothers and pray for their brother's long life .This has a bit ‘ Sarokar ‘to you and to us. Happy Sama-Chakeba. Jai Maithili , Jai Mithila.
Relevance of "SAMA-CHAKEBA"
The mythological aspect :-
Sama-chakeba is originated to some excerpts of ancient ‘Padma Puran’.There is some reference about the love and sacrifice of Samb, the son of Lord shri Krishna for his sister named Sambwati. It is mentioned that a villain like character named chudak (known as ‘Chugila’ in Mithila) always intimated untrue story of each and every movements in kingdom to Lord Krishna. Once, he tweeted to Krishna that Sambwati was perhaps making love with Rhishi while going on the way to Vrindavan . Being angered, Krishna had given Shraap(bad curse ) to his daughter and Rhishi to embody the life of a love bird ‘MAINA’. And it happened instantly. Knowing this, the husband of Sambwati , named Chakrawak ( called as ‘Chakeba’ in Mithila ) passionately self embodied the life of ‘Maina’ in deep sorrow to have the company of his beloved wife. This incident shocked Samb ,the brother of Sambwati .He immediately sat on Tapasya or on wish dream puja unto the reversal of Shraap/ Curse . Seeing samb’s love and sacrifice for his sister, Lord Krishna , became happier and gave blessings and reversed the Shraap for the happiness of the family .Thus , the immortal love and sacrifice of Brother for the sister is being celebrated as Folk festival ‘Sama –Chakeba’ by the Maithil sisters for their brothers’ long life and happiness in all over Mithila .
Wednesday, November 17, 2010
देवोत्थान एकादशी .-सिर्फ यादे टा रहि गेल .
जहिया सँ प्रवासी भेलहुँ ,देव पीतर सबसँ गेलहुं .कतेको साल बीतल देवोत्थान एकादशी के दिन गाँव में रहि पूजा देखला . परन्तु आब त सिर्फ यादे टा रहि गेल अछि .ओकरे फ्लैश बैक में समय बीति जाइत अछि . एक दिन पहिले सँ बड़का कक्का कहथि, रबिन्द्र बुझल',काल्हि भगवान छह महिना के बाद जगथिन. विस्मित होइत पुछियनी ,कक्का से कोना? अखन कि भगवान सुतल छथिन ? संसार कोना चलि रहल छै ? कहैत बकलेल , इ कह; जे सुतल में कि हमरा सब संवेदनहीन भ जाएत छी ? नै ने.. .सब प्राणी हुनके माया स एहि संसार में जीव रहल अछि. हमरा लोकईन त नाम मात्र छी. अच्छा हे याइद रखिह ,काल्हि स्कूल स फ़िरबा काल 'महंथ बाला' खेत स कने नीक ताकिक' चारि टा कुशियार कटने अबिह. बीचहि में टोकि दियनी, कक्का भगवान सुतलखिन कहिया ? कहथि -भादव मास एकादशी दिन शंखासुर राक्षस के मारि गाढ़ निन्न में सुति रहलाह आ' आब कार्तिक शुक्ल एकादशी दिन जागि जेताह.
स्कूल स फ़िरबा काल कुशियार लेने घर आबी . आँगन चिकनी मैट स नीपल चकचक भेल रहै .सभ गोटे लागि जाई 'कुशियारक गुल्ला' काटई में. एहि पूजा में कुशियारक गुल्ला सबस मुख्य भोगक प्रसाद. माय आ काकी पिठार लेने अरिपन बनाब में व्यस्त .बड़की काकी कहथिन ,कुसुमसुन्नैर ,हम नहाई लेल जाई छी ,सूर्यास्त भ गेलै,पूजा में देर भेला स 'बुढ़बा' फेर हल्ला करत .अहाँ कने तुलसी चौरा स 'धर्मराज' घर तक अरिपन बना लीय. माय संगही संग लागि जाय अरिपन में. भगवानक पैर चिन्हित होइन ,खराम बनैल जाई पिठार स .ओही में सिंदूर लगेबाक कार्य करी हम सब. ताधैर भैया 'पेट्रोमाक्स' लाइट स आँगन के प्रकाशित क़ लैथ. बड़का कक्का एक हाथ में फुल्दाली आ दोसर हाथ में अछिन्जल लेने आबि, बीच आँगन में अरिपन स चारू तरफ सुसज्जीत 'भगवानक आसन' लग आसनी पर बैस, पुजाक सामग्री मंगबा पूजा शुरू करैथ. काकी आबि क़ नारिकेर,मखान ,मिश्री के भोग बाला डाली सजबथी.हम सब धुप दीप आ अगरबत्ती जराबी . पाछु दुआइर स धर्मराजक गीत शुरू करैथ भौजीसब. . एमहर गीत ,मंत्रोचार आ अगरबत्तीक़ सुगंध स आँगन मंदिर में परिवर्तित बुझाई .की भव्य रमणीय आभास !.बीच बीच में दीप में बाती आ घी के ध्यान राखी हम . आरती के समय स पहिले 'विष्णु' कक्का के आँगन स घड़ी -घंटा दौरिक़ लाबी . कर्पुर गौरंगकरुनावतारम ......शुरू भ जाए आरती. बीचहिं में पितियौत कक्का ,भैया सब घडी -घंटा के आवाज सुनि दौरथी आरती में ,डरे की कहीं बाद में बड़का कक्का के डांट नै सुनी. चारि गोटे दहिना हाथें 'शालीग्राम ' भगवान के आसन के ऊपर नीचा क़ ,जगाबथी. आ एहि तरहे एकादशी पूजा सम्पन्न भ जाई. आब त सिर्फ यादे टा रहि गेल .......
स्कूल स फ़िरबा काल कुशियार लेने घर आबी . आँगन चिकनी मैट स नीपल चकचक भेल रहै .सभ गोटे लागि जाई 'कुशियारक गुल्ला' काटई में. एहि पूजा में कुशियारक गुल्ला सबस मुख्य भोगक प्रसाद. माय आ काकी पिठार लेने अरिपन बनाब में व्यस्त .बड़की काकी कहथिन ,कुसुमसुन्नैर ,हम नहाई लेल जाई छी ,सूर्यास्त भ गेलै,पूजा में देर भेला स 'बुढ़बा' फेर हल्ला करत .अहाँ कने तुलसी चौरा स 'धर्मराज' घर तक अरिपन बना लीय. माय संगही संग लागि जाय अरिपन में. भगवानक पैर चिन्हित होइन ,खराम बनैल जाई पिठार स .ओही में सिंदूर लगेबाक कार्य करी हम सब. ताधैर भैया 'पेट्रोमाक्स' लाइट स आँगन के प्रकाशित क़ लैथ. बड़का कक्का एक हाथ में फुल्दाली आ दोसर हाथ में अछिन्जल लेने आबि, बीच आँगन में अरिपन स चारू तरफ सुसज्जीत 'भगवानक आसन' लग आसनी पर बैस, पुजाक सामग्री मंगबा पूजा शुरू करैथ. काकी आबि क़ नारिकेर,मखान ,मिश्री के भोग बाला डाली सजबथी.हम सब धुप दीप आ अगरबत्ती जराबी . पाछु दुआइर स धर्मराजक गीत शुरू करैथ भौजीसब. . एमहर गीत ,मंत्रोचार आ अगरबत्तीक़ सुगंध स आँगन मंदिर में परिवर्तित बुझाई .की भव्य रमणीय आभास !.बीच बीच में दीप में बाती आ घी के ध्यान राखी हम . आरती के समय स पहिले 'विष्णु' कक्का के आँगन स घड़ी -घंटा दौरिक़ लाबी . कर्पुर गौरंगकरुनावतारम ......शुरू भ जाए आरती. बीचहिं में पितियौत कक्का ,भैया सब घडी -घंटा के आवाज सुनि दौरथी आरती में ,डरे की कहीं बाद में बड़का कक्का के डांट नै सुनी. चारि गोटे दहिना हाथें 'शालीग्राम ' भगवान के आसन के ऊपर नीचा क़ ,जगाबथी. आ एहि तरहे एकादशी पूजा सम्पन्न भ जाई. आब त सिर्फ यादे टा रहि गेल .......
Tuesday, November 16, 2010
Monday, November 15, 2010
भ्रष्टाचार का भश्मासुर
मान गये स्पेक्ट्रुम राजा जी,जरा दीवाल पर लिखी इबारत पढ़ ली होती. खैर, अंत भला तो सब भला. माना कि आपकी सबसे बड़ी निधी दरअसल करूणानिधि जी है, परन्तु याद है, आपने शपथग्रहण के समय किसकी सौगंध खायी थी, नही न ?. भारतीय संविधान की. उससे ऊपर कोई नहीं. अपनी लाज खुद बचा ली होती. देखिये, अब आपके करीबी ही
आपके शर्मसार होने के बाद जश्न मना रहे है. पोलिटिक्स में कोई भी परमानेंट दोस्त या दुश्मन नहीं होता.
और अब येदुरप्पा जी कि बारी है. आपकी तरह वो भी सारे फैसले सही और पुरानी नीतियों के आधार पर ही किया है .क्या बात है! सारे सही फैसले अपने संतानों और सिश्तेदारों के लिए ही .वाह वाह! यही न कि ये महज एक संयोग है . आपने क्या खूब कहा कि ये "आदर्श" नहीं है ,माननीय मुख्यमंत्री जी ये "आदर्श" घोटाले से क्या कम है? शायद नहीं. वैसे भी राष्ट्रीय सम्मान के पुरोधा बीजेपी ( द पार्टी विथ दिफ्फेरेंस) को बंगारू लक्ष्मण जी से ज्यादा थोड़े ही आप शर्मिंदा कर पायेंगे .है न? मैं भी सहमत हूँ आपसे .फिर राजदीप सर देसाई अकसर कहते है कि "हमाम में सब नंगे हैं".क्या फर्क पड़ता है? तो क्या ये नंगापन पब्लिक डोमेन में चल पायेगा ? नहीं . मान लीजिये, आप अपनी लाज खुद रख लीजिये. आपकी जनता आपको बहुत धन्यवाद् देगी. वर्ना ये भ्रष्टाचार का भश्मासुर आपको भी भष्म करने वाला है क्योंकि इसका सरोकार है हमसे, आम आदमी से, आपसे .......धन्यवाद् .
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